मास्टरिंग द मार्केट साइकिल: हम अभी कहाँ खड़े हैं?
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30 सेकंड का सारांश
- किताब
- मास्टरिंग द मार्केट साइकिल (2018)
- लेखक
- हावर्ड मार्क्स, ओकट्री कैपिटल के सह-संस्थापक
- बड़ी बात
- अंदाज़ा लगाना बंद कीजिए। स्थिति समझिए।
- क्या देखें
- पैसा कितनी आसानी से उधार मिल रहा है
- कीमत
- सालों तक आप ग़लत दिखेंगे
हावर्ड मार्क्स कहते हैं कि बाज़ार की भविष्यवाणी करना संभव नहीं है, लेकिन साइकिल में हम अभी कहाँ खड़े हैं यह समझना संभव है। इसके लिए आप देखते हैं कि आसपास के लोग जोखिम के साथ कैसा बर्ताव कर रहे हैं, और सबसे बढ़कर यह कि पैसा कितनी आसानी से उधार मिल रहा है। फिर आप थोड़ा-थोड़ा करके अपना निवेश घटाते-बढ़ाते हैं, पूरा अंदर या बाहर नहीं जाते।
मुख्य बातें
- बाज़ार आगे क्या करेगा यह कोई नहीं बता सकता। मार्क्स कहते हैं कोशिश करना ही छोड़ दीजिए।
- लेकिन आज बाज़ार कहाँ खड़ा है यह आप समझ सकते हैं, सिर्फ़ आसपास के लोगों को देखकर।
- बाज़ार अर्थव्यवस्था से कहीं ज़्यादा ऊपर-नीचे झूलता है, क्योंकि बाज़ार लोगों से बनता है और लोग बात बढ़ा देते हैं।
- सबसे साफ़ संकेत है उधार। जब क़र्ज़ आसान होता है, कमज़ोर कारोबार चलते रहते हैं और उनकी दिक़्क़त छुपी रहती है। जब उधार रुकता है, सब एक साथ सामने आ जाता है।
- सही जवाब है अपना निवेश थोड़ा बदलना। कभी भी तारीख़ पर दाँव नहीं।
वह सवाल जिसका जवाब किसी के पास नहीं
कोई आपसे पूछता है कि इस साल बाज़ार कहाँ जाएगा।
आप नौ जवाब पहले ही सुन चुके हैं। एक कहता है दोगुना हो जाएगा। एक कहता है आधा। दोनों आश्वस्त लगते हैं। दोनों के पास चार्ट हैं।
हावर्ड मार्क्स ने पचास साल बाज़ार में बिताए। उनका जवाब है कि उन्हें नहीं पता। और वे यह भी कहते हैं कि किसी और को भी नहीं पता, न टीवी पर बैठे लोगों को, न अरबों का पैसा सँभालने वालों को।
लगता है जैसे किताब पहले ही पन्ने पर ख़त्म हो गई। असल में उनकी किताब वहीं से शुरू होती है, क्योंकि उनके हिसाब से हम ग़लत सवाल पूछ रहे हैं।
मार्क्स यह नहीं कहते कि बायाँ रास्ता मुश्किल है। वे कहते हैं कि उस रास्ते के आख़िर में कुछ है ही नहीं। इसलिए वे दूसरी तरफ़ चलते हैं, और बाक़ी किताब वहाँ जो मिलता है वही है।
बाक़ी किताब दूसरे सवाल के बारे में है। बाक़ी यह लेख भी।
बाज़ार और अर्थव्यवस्था एक चीज़ नहीं हैं
मार्क्स एक अजीब बात से शुरू करते हैं।
अर्थव्यवस्था धीरे चलती है। हर साल थोड़ी बढ़ती है। बुरे साल में थोड़ी घटती है। वह किसी को चौंकाती नहीं।
बाज़ार बिल्कुल धीरे नहीं चलता। वह उड़ता है और गिरता है। और यह सब उसी अर्थव्यवस्था के आसपास होता है जो मुश्किल से हिली।
यह फ़र्क़ क्यों? क्योंकि बाज़ार अर्थव्यवस्था नहीं है। बाज़ार एक कमरा है जो अर्थव्यवस्था के बारे में अंदाज़ा लगाते लोगों से भरा है। और लोग बात बढ़ा देते हैं।
कुछ थोड़ा बेहतर होता है। लोग मान लेते हैं कि बहुत बेहतर होगा। तो वे ज़्यादा क़ीमत देते हैं। अब वह ऊँची क़ीमत अगले आदमी को यक़ीन दिलाती है कि सच में हालात सुधर रहे हैं। तो वह और ज़्यादा देता है।
फिर यही सब उल्टा चलता है।
लहर बीच की रेखा को बार-बार पार करती है। वहाँ रुकती कभी नहीं। मार्क्स इस बात पर बहुत ज़ोर देते हैं।
बीच की रेखा देखिए। वही “सही क़ीमत” है। अब ध्यान दीजिए कि लहर वहाँ कितना कम समय बिताती है।
यह किताब की सबसे काम की तस्वीर है। यह कुछ भी भविष्यवाणी नहीं करती। बस एक ग़लत सोच हटा देती है जो हम सब पाले रहते हैं, कि बाज़ार आम तौर पर सही रहता है और कभी-कभी पागल हो जाता है। मार्क्स कहते हैं उल्टा है। बाज़ार आम तौर पर सही के अलावा कहीं और होता है।
यह पहले भी हुआ है। कई बार
उनकी बात मानना ज़रूरी नहीं। यही शक्ल बार-बार दिखती है।
ये लहरें शक्ल हैं, नाप नहीं। इन्हें साफ़ दिखने के लिए एक ही ऊँचाई पर बनाया गया है, जिसका मतलब यह नहीं कि ये सब एक ही आकार के थे। इनमें से किसी एक के बारे में पढ़िए, सब अच्छी तरह दर्ज हैं।
इनमें से हर एक सार्वजनिक इतिहास है, जिस पर सैकड़ों किताबें लिखी गई हैं। चीज़ पूरी तरह बदल जाती है। ट्यूलिप, जहाज़ के शेयर, घर, इंटरनेट कंपनियाँ। कहानी बिल्कुल नहीं बदलती।
कुछ ऊपर जाता है। लोग समझाते हैं कि इस बार बात अलग है। पैसा उधार लेना आसान हो जाता है। और लोग जुड़ते हैं, कई उधार लेकर। क़ीमत उस चीज़ की असली कमाई से कोई रिश्ता नहीं रखती। फिर भरोसा पलटता है, उधार रुकता है, और गिरावट चढ़ाई से कहीं तेज़ होती है।
भारत के पास भी इस सूची में अपने नाम हैं। 1992 का प्रतिभूति घोटाला और उसके बाद आई गिरावट भारतीय वित्तीय इतिहास की सबसे ज़्यादा जाँची गई घटनाओं में से है। 2000 और 2001 की तेज़ गिरावट भी। अगर आप साइकिल को उन मिसालों से समझना चाहते हैं जो आपने बचपन से सुनी हैं, तो ये दोनों अच्छी तरह दर्ज हैं।
History doesn't repeat itself, but it does rhyme.
आम तौर पर मार्क ट्वेन को दिया जाता है, हालाँकि उनके लिखे में नहीं मिलता
हर बार ब्योरा अलग होता है। शक्ल नहीं बदलती, क्योंकि शक्ल लोगों से बनती है, और लोग नहीं बदले।
भारत में कहाँ देखें
मार्क्स कहते हैं कि यह पढ़ाई हर उस आदमी के लिए उपलब्ध है जो देखना चाहे। इस बाज़ार में देखने का मतलब क्या है, यह रहा, और इसमें से किसी पर पैसा नहीं लगता।
इन तीनों में से एक भी चार्ट नहीं है, और यह जानबूझकर है। मार्क्स जिन संकेतों की परवाह करते हैं वे सब सार्वजनिक दस्तावेज़ों में आम भाषा में आते हैं। इसीलिए जिसके पास न टर्मिनल है न सब्सक्रिप्शन, वह यहाँ पीछे नहीं है।
शुरुआत आरबीआई से कीजिए। वह साल में कई बार, विस्तार से छापता है कि वह क्या सोचता है। आप उसे सिर्फ़ एक चीज़ के लिए पढ़ रहे हैं: क्या उसे चिंता है कि क़र्ज़ बहुत तेज़ बढ़ रहा है, या वह और क़र्ज़ देने को प्रोत्साहित करना चाहता है? यही अकेला सवाल क़र्ज़ चक्र का बड़ा हिस्सा है, और वह भी उस संस्था के शब्दों में जिसके पास सबसे अच्छा नज़ारा है।
फिर देखिए कि पैसा आसानी से कौन जुटा रहा है। नई लिस्टिंग, और किसे पैसा मिल रहा है। जब वे कारोबार आराम से पैसा जुटा रहे हों जिन्हें दो साल पहले कुछ भी जुटाने में मुश्किल होती, तो यह वही बात है जो मार्क्स क़र्ज़ देने वालों की होड़ के बारे में कहते हैं, बस दूसरे दरवाज़े से आती हुई।
फिर नए आने वालों को गिनिए। भारत में यह छपता है कि कितने नए डीमैट खाते खुल रहे हैं, और म्यूचुअल फंड में आने वाला पैसा हर महीने दर्ज होता है। आपको आँकड़े नहीं चाहिए। आपको दिशा चाहिए, और यह कि आसपास के जिन लोगों ने कभी शेयरों की बात नहीं की थी उन्होंने शुरू की या नहीं।
एक भारतीय पेच जानने लायक है। यहाँ आने वाले पैसे का एक बड़ा और बढ़ता हिस्सा किसी फ़ैसले से नहीं, तय मासिक कार्यक्रम से आता है। जो पैसा भरोसे के होने या न होने से बेपरवाह आता रहता है वह उस पैसे से अलग बर्ताव करता है जो भरोसे की वजह से आता है। लंबी गिरावट में वह कैसा बर्ताव करेगा, यह अभी कोई नहीं जानता, क्योंकि इस आकार पर उसकी परीक्षा अब तक नहीं हुई है।
दो घटनाएँ एक एक शाम देने लायक हैं, और दोनों सैकड़ों जगह दर्ज हैं। 1992 का प्रतिभूति घोटाला और उसके बाद आई गिरावट। और 2018 में ग़ैर बैंकिंग क़र्ज़ में आई जकड़न, जो इसी लेख वाला क़र्ज़ का चक्र पूरी रफ़्तार पर, और हमारी अपनी याद में।
सीढ़ी से ऊपर, लिफ़्ट से नीचे
उन सब घटनाओं में एक और चीज़ एक जैसी है, और वह अपनी अलग तस्वीर की हक़दार है।
बाज़ार धीरे ऊपर जाता है और तेज़ी से नीचे आता है।
एक प्राइस चार्ट दोनों को एक ही तरह की रेखा से बनाता है, इसलिए यह फ़र्क़ आसानी से छूट जाता है। फ़र्क़ मायने रखता है, क्योंकि यही वजह है कि ऊपर के पास निकलने की योजना बनाने वाले लोग आम तौर पर निकल नहीं पाते।
चढ़ाई आपको आराम से बस जाने के लिए साल देती है। वह आपको रुकने का इनाम बार-बार देती है, जब तक रुकना ही सबसे सही फ़ैसला न लगने लगे।
गिरावट कुछ नहीं देती। वह हफ़्तों या महीनों में आती है। जो लोग ऊपर के पास बेचने का सोच रहे थे, उनमें से ज़्यादातर बेच नहीं पाते।
वजह कड़वी है। जिस पैटर्न ने उन्हें रुकना सिखाया, वही पैटर्न उन्हें रुकने की सज़ा देता है।
वह चीज़ जो आप सच में देख सकते हैं
अब ऊपर की हर बात में एक दिक़्क़त आती है।
मार्क्स कहते हैं साइकिल लोगों की भावनाओं से चलती है। ठीक है। लेकिन भावनाओं को नापा नहीं जा सकता। दीवार पर कोई मीटर नहीं लगा जिस पर लिखा हो “लालच: 74%”।
तो अगर साइकिल भावनाओं से चलती है, और भावनाएँ दिखती नहीं, तो क्या यह पूरा विचार बेकार है?
यही किताब का मोड़ है। मुझे इसे पकड़ने में दूसरी बार पढ़ना पड़ा।
भावनाएँ निशान छोड़ती हैं। वह निशान है उधार दिया गया पैसा।
आप भरोसा नहीं देख सकते। लेकिन आप यह देख सकते हैं कि एक कमज़ोर कारोबार को इस महीने क़र्ज़ मिला या नहीं। यह राय नहीं है। या तो क़र्ज़ हुआ या नहीं हुआ।
यह जितना लगता है उससे ज़्यादा मायने रखता है, क्योंकि उधार लिया पैसा ही भावना को क़ीमत में बदलता है। सिर्फ़ उत्साह शादी की बातचीत है। उत्साह के साथ क़र्ज़ कोई सच में ख़रीद रहा है। और ख़रीदारी ही बाज़ार हिलाती है।
कुछ अच्छे साल गुज़रते हैं। क़र्ज़ देने वालों का बहुत कम पैसा डूबता है।
कुछ न डूबने से उधार देना सुरक्षित लगने लगता है, तो वे आपस में ग्राहकों के लिए होड़ करते हैं।
यह होड़ आप तेज़, सस्ते, और पहले से कमज़ोर लोगों को क़र्ज़ देकर जीतते हैं।
अब कमज़ोर क़र्ज़दार के पास पैसा है। वे चलते रहते हैं, तो उनकी दिक़्क़त छुपी रहती है।
हालात पलटते हैं। सबसे कमज़ोर लोग नाकाम होते हैं, और एक साथ नाकाम होते हैं।
क़र्ज़ देने वाले उधार रोक देते हैं, जिससे बाक़ी सबके नीचे से पैसा निकल जाता है।
अब चीज़ें सस्ती हैं और कोई हाथ नहीं लगाता। और यही वह हालत है जहाँ से अगला अच्छा दौर शुरू होता है।
हर क़दम नीचे वाले को पैदा करता है। इसीलिए मार्क्स सुर्ख़ियों के बजाय क़र्ज़ देने वालों को देखते हैं। जब तक दिक़्क़त ख़बर में आती है, पाँचवाँ क़दम हो चुका होता है।
भारत ने यह चक्र 2018 में चलते देखा, जब एक बड़ी बुनियादी ढाँचा वित्त कंपनी अपना क़र्ज़ नहीं चुका पाई। दिक़्क़त एक कंपनी तक नहीं रुकी। पूरे ग़ैर-बैंकिंग वित्त क्षेत्र में उधार सख़्त हो गया, और जो कारोबार सालों से आराम से क़र्ज़ ले रहे थे वे अचानक नहीं ले पाए। वे कारोबार रातोंरात बदल नहीं गए थे। पैसा बदल गया था।
यही याद रखने लायक़ है। जब उधार सूखता है, जो दिक़्क़तें शुरू से मौजूद थीं वे एक साथ दिखने लगती हैं, और लगता है जैसे कहीं से अचानक आ गईं। ऐसा नहीं है। उधार का पैसा उन्हें ढक रहा था।
कमरे को पढ़ना
तो मार्क्स असल में आपसे करवाना क्या चाहते हैं?
आसपास ईमानदारी से देखिए, और कुछ सीधे सवालों का जवाब दीजिए। क़ीमत के सवाल नहीं। लोगों के सवाल।
ध्यान दीजिए कि सुई है ही नहीं। आपने जो भी भावना मीटर देखा होगा वह कहीं न कहीं इशारा करता है, जो चुपके से यह कह देता है कि आज का पाठ एक पक्की संख्या है। वह है नहीं। आप कमरे को देखते हैं और तय करते हैं, और आप ग़लत हो सकते हैं।
| यह देखिए | साइकिल के ऊपर के पास | नीचे के पास |
|---|---|---|
| आम मूड | बेताब, छूट जाने का डर | थका हुआ, और खोने का डर |
| लोग जोखिम को मानते हैं | पैसा बनाने का तरीक़ा | हर हाल में बचने लायक़ चीज़ |
| क़र्ज़ देने वाले | देने के लिए होड़ कर रहे हैं | सख़्त सवाल पूछ रहे हैं |
| कमज़ोर कारोबार | आसानी से पैसा जुटा लेते हैं | मुश्किल से कुछ जुटा पाते हैं |
| बार-बार सुनते हैं | “अब पुराने नियम नहीं चलते” | “अब कोई उसे हाथ नहीं लगाता” |
| नए निवेशक | बड़ी संख्या में आ रहे हैं | कहीं दिखते ही नहीं |
हर पंक्ति आज के बारे में है। आप छहों आज शाम जाँच सकते हैं। इनमें से कोई आपसे अगले साल के बारे में कुछ नहीं पूछता।
पाँचवीं पंक्ति पर थोड़ा रुकिए। “अब पुराने नियम नहीं चलते” कभी-कभी सच होता है। कभी-कभी सच में चीज़ें बदल जाती हैं। लेकिन मार्क्स ने देखा कि यह वाक्य सबसे ज़्यादा चरम के पास सुनाई देता है। वहाँ सुनाई देता है क्योंकि जब पुराना तरीक़ा क़ीमत को सही नहीं ठहरा पाता, तब यही दलील बचती है। वे यह नहीं कह रहे कि वाक्य हमेशा झूठा है। वे कह रहे हैं कि ध्यान दीजिए जिस पल आपको इसकी ज़रूरत पड़ने लगे।
आख़िरी पंक्ति वह है जिसे भारतीय पाठक सबसे जल्दी पहचानेगा। जब बाज़ार कुछ समय से चढ़ रहा हो, नए निवेशक बड़ी संख्या में आते हैं। ऐप ख़रीदने को चार टैप का काम बना देते हैं। और आने वालों में से कई ने कभी गिरता बाज़ार देखा ही नहीं। यह उनकी बुराई नहीं है, सभी कहीं न कहीं से शुरू करते हैं। यह बस जानकारी है, और मुफ़्त है।
अपने जवाब का क्या करें
मान लीजिए आपने देखा और लगा कि चीज़ें गरम हैं। अब क्या?
साफ़ जवाब लगता है सब कुछ बेच दो। मार्क्स मना करते हैं, और उनकी वजह साफ़ है। सब बेच देना ख़ुद एक भविष्यवाणी है। वह तभी काम करता है जब आपको पता हो कि वापस कब आना है, और “कब” वही चीज़ है जिसके बारे में वे पूरी किताब कह चुके हैं कि कोई नहीं जानता।
उनका जवाब छोटा और काफ़ी नीरस है।
नीचे के अंक बनाए हुए गोल अंक हैं। वे सिर्फ़ विचार की शक्ल दिखाने के लिए हैं।
चीज़ें सस्ती लगती हैं और सब उदास हैं
₹90,000 / ₹10,000
आगे झुकना, जब ज़्यादातर लोग नहीं झुकेंगे।
चीज़ें सामान्य लगती हैं
₹70,000 / ₹30,000
यहाँ आप ज़्यादातर समय रहते हैं।
चीज़ें महँगी लगती हैं और सब उत्साहित हैं
₹50,000 / ₹50,000
पीछे हटना, जब ज़्यादातर लोग आगे बढ़ रहे हैं।
देखिए क्या ग़ायब है। कोई पंक्ति शून्य पर नहीं है और कोई पूरे पर नहीं। सबसे सतर्क पाठ पर भी आधा पैसा बाज़ार में ही रहता है।
यह छोटा दायरा ही पूरा डिज़ाइन है, और इसे डरपोक समझना आसान है।
यह डरपोक नहीं है। यह यह मानकर बनाया गया है कि आपका पाठ अक्सर ग़लत होगा। जो तरीक़ा सिर्फ़ तब चलता हो जब आप कमरे को सही पढ़ें, वह तरीक़ा नहीं है। वह दाँव है।
वह क़ीमत जो आपको चुकानी पड़ती है
मार्क्स अपने ही विचार की कमज़ोरियों के बारे में असामान्य रूप से ईमानदार हैं। उन्हें छोड़ना आपको वह चीज़ बेचना होगा जो वे हैं ही नहीं।
जल्दी होना और ग़लत होना बिल्कुल एक जैसा दिखता है, और यह लंबे समय तक चलता है।
जो बाज़ार महँगा लगता है वह सालों तक महँगा रह सकता है। उन सालों में आप सबसे कम रखते हैं। सबसे कम कमाते हैं। आपके पास कोई सबूत नहीं कि आप सही हैं। और आप उन लोगों को बेहतर करते देखते हैं जिन्होंने पूरे विचार को नज़रअंदाज़ किया। ज़्यादातर लोग यह नहीं झेल पाते। वे तीसरे साल के आसपास छोड़ देते हैं।
यह ईमानदार तस्वीर है। न चालाक टाइमिंग, न ऊपर के पास सफ़ाई से निकलना। ज़्यादातर यह बस खड़े रहना है जब भीड़ आपके आसपास से दोनों तरफ़ भागती है, उतनी देर तक जितनी ठीक लगती नहीं।
तीन और दिक़्क़तें नाम लेने लायक़ हैं।
पाठ एक राय है, संख्या नहीं। दो समझदार लोग एक ही बाज़ार को देखकर उल्टा नतीजा निकाल सकते हैं। सालों तक किसी को ग़लत साबित नहीं किया जा सकता। इससे यह तरीक़ा उस नतीजे की सजावट बनाना बहुत आसान हो जाता है जो आप पहले ही चाह रहे थे।
यह नहीं बताता कि क्या ख़रीदें। किताब कितना के बारे में है, कौन सा के बारे में नहीं। आप साइकिल ठीक पढ़कर भी ग़लत चीज़ चुनकर पैसा खो सकते हैं।
और यह आपसे वही करने को कहती है जो अभी-अभी समझाया गया कि आप करने के लिए बने ही नहीं हैं। मार्क्स अध्याय भर समझाते हैं कि लोग सबसे ग़लत समय पर हिम्मत क्यों दिखाते हैं। फिर आपसे कहते हैं कि आप अपवाद बनिए, उसी दिमाग़ से जिसे उन्होंने अभी बयान किया। वे इसे सच में सुलझाते नहीं, और मुझे लगता है उन्हें पता है।
एक काम की सूची
मार्क्स आपको चालें नहीं, पढ़ने का एक तरीक़ा देते हैं। इसीलिए उनसे सहमत होना आसान है और उन्हें इस्तेमाल करना मुश्किल। यह वह सूची है जिसका जवाब उनका तरीक़ा असल में माँगता है।
जो आप इस हफ़्ते देख सकते हैं
7इसमें से किसी पर पैसा नहीं लगता, और कुछ भी यह नहीं बताता कि क्या खरीदना है। यह सब पढ़ना और लिखना है।
यहाँ कुछ भी यह नहीं कहता कि क्या खरीदें या बेचें। हर पंक्ति कुछ देखने या लिख लेने की बात है।
इनमें से किसी के लिए पैसे वाली सेवा नहीं चाहिए। चार के लिए तो बस एक क़लम और दस मिनट चाहिए, और मोटे तौर पर वही बात वे बार बार कहते हैं।
जो सच में रखने लायक़ है
किताब से फ़ायदा लेने के लिए यह सब अपनाना ज़रूरी नहीं। तीन चीज़ें ख़ुद अपने दम पर टिकती हैं।
आसपास का तापमान देखना सीखिए। जब वे लोग जिन्होंने कभी शेयर की बात नहीं की, पूछने लगें कि कौन सा ख़रीदें, तो वह जानकारी है। जब वही लोग चुप हो जाएँ, वह भी जानकारी है। दोनों में से कोई नहीं बताता कि आगे क्या होगा। किसी एक को कार्रवाई का संकेत मान लेना वही भविष्यवाणी होगी जो मार्क्स करने से मना करते हैं।
देखते रहिए कि पैसा कितनी आसानी से उधार मिल रहा है। यह मूड का वह हिस्सा है जो निशान छोड़ता है, और इसे आप आम कारोबारी ख़बरों से देख सकते हैं।
डायल में सोचिए, स्विच में नहीं। आप किसी भी बाज़ार के बारे में जो भी तय करें, धीरे-धीरे बदलने की आदत छलाँग मारने की आदत से बेहतर है। यह चीज़ तब भी बची रहती है जब आप किताब की बाक़ी सब बातें फेंक दें।
ख़ुद को परखिए
4 questionsAnswer in your head first. Guessing and being wrong still helps you remember.
मार्क्स क्यों कहते हैं कि बाज़ार की भविष्यवाणी करना मेहनत की बर्बादी है?
क्योंकि बाज़ार लाखों लोग हैं जो एक दूसरे पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। ऐसे तंत्र के नीचे कोई स्थिर नियम होता ही नहीं, तो ढूँढ़ने के लिए कुछ पक्का है ही नहीं। वे यह नहीं कह रहे कि यह मुश्किल है। वे कह रहे हैं कि वहाँ मिलने लायक़ कुछ है ही नहीं।
मार्क्स कहते हैं साइकिल भावनाओं से चलती है। तो वे भावनाओं के बजाय उधार क्यों देखते हैं?
क्योंकि भावना नापी नहीं जा सकती, लेकिन क़र्ज़ देखा जा सकता है। एक कमज़ोर कारोबार ने इस महीने पैसा जुटाया या नहीं, यह साफ़ बात है। उधार उसी मूड के साथ चलता है, तो वह एक न दिखने वाली चीज़ का दिखने वाला निशान दे देता है।
बाज़ार महँगा दिखने पर भी वे सब बेचने से मना क्यों करते हैं?
क्योंकि नक़दी में जाना भेस बदला हुआ अंदाज़ा है। वह तभी काम करता है जब आपको पता हो कि वापस कब आना है, और वही एक चीज़ है जिसके बारे में वे कहते हैं कोई नहीं जानता। इसलिए वे कितना रखते हैं यह बदलते हैं, और हमेशा कुछ न कुछ रखते हैं।
उनके तरीक़े की सबसे बड़ी व्यावहारिक क़ीमत क्या है?
समय। महँगा दिखने वाला बाज़ार सालों तक महँगा रह सकता है, और उन सालों में आप विचार को नज़रअंदाज़ करने वालों से कम कमाते हैं, बिना किसी सबूत के कि आप सही हैं। ज़्यादातर लोग ठीक उन्हीं सालों में छोड़ देते हैं।
श्रेय जिनका हक़ बनता है
ऊपर का हर विचार हावर्ड मार्क्स का है। यह Mastering the Market Cycle: Getting the Odds on Your Side से आया है, जिसे Houghton Mifflin Harcourt ने 2018 में छापा। उन्होंने इसका ज़्यादातर हिस्सा पहले अपने निवेशक मेमो में तैयार किया, जो वे 1990 से लिख रहे हैं, और The Most Important Thing (2011) में।
एक लेख वह नहीं दे सकता जो किताब को अच्छी बनाता है। मार्क्स अपनी बात धीरे-धीरे बनाते हैं, उन चक्रों से गुज़रते हुए जो उन्होंने जिए और उन फ़ैसलों से जो उन्होंने सच में लिए। वे किसी भी छोटे रूप से कहीं ज़्यादा मज़ेदार हैं और ख़ुद पर कहीं ज़्यादा शक़ करते हैं। वही शक़ असली बात है। वही सबूत है कि वे सच में मानते हैं कि कोई भविष्यवाणी नहीं कर सकता।
अगर यहाँ कुछ काम का लगा, तो वह उनसे आया। किताब ख़रीदने लायक़ है।
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स्रोत
- Howard Marks, Mastering the Market Cycle: Getting the Odds on Your Side (Houghton Mifflin Harcourt, 2018)
- Howard Marks, The Most Important Thing: Uncommon Sense for the Thoughtful Investor (Columbia Business School Publishing, 2011)
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या यह सिर्फ़ मार्केट टाइमिंग का नया नाम है?
नहीं। टाइमिंग का मतलब है यह कहना कि कब क्या होगा, और मार्क्स यह करने से साफ़ मना करते हैं। वे सिर्फ़ आज के बारे में बात करते हैं। क्या हालात असामान्य रूप से उदार हैं, या असामान्य रूप से सख़्त? आप पूरे भरोसे से कह सकते हैं कि बाज़ार महँगा है, और फिर भी आपको नहीं पता कि वह एक महीना और महँगा रहेगा या चार साल।
वे उधार पर इतना ध्यान क्यों देते हैं?
क्योंकि उधार मूड का वह हिस्सा है जो आप सच में देख सकते हैं। बाज़ार कितना उत्साहित है यह कोई नाप नहीं सकता। लेकिन एक कमज़ोर कारोबार को इस महीने क़र्ज़ मिला या नहीं, यह साफ़ बात है। सिर्फ़ उत्साह बातों तक रहता है। उत्साह के साथ सस्ता क़र्ज़ ख़रीदारी बन जाता है, और ख़रीदारी ही क़ीमत हिलाती है।
मैं सिर्फ़ एसआईपी करता हूँ। क्या यह मेरे काम का है?
कम काम का है, और यह अच्छी बात है। हर महीने एक तय रक़म लगाने से आप क़ीमत गिरने पर अपने आप ज़्यादा यूनिट ख़रीद लेते हैं, तो यह दिक़्क़त का आधा हिस्सा ख़ुद सँभाल लेता है। आपके लिए फ़ायदा समझने में है। अगर आप जानते हैं कि सब लोग एक साथ आश्वस्त क्यों हो जाते हैं, तो आप एक बड़ी एकमुश्त रक़म सबसे ग़लत समय पर लगाने से बच सकते हैं।
बिना किसी पेड डेटा के उधार पर नज़र कैसे रखें?
आप रोज़ की कारोबारी ख़बरें सिर्फ़ एक चीज़ के लिए पढ़ते हैं: पैसा किसे मिल रहा है। क्या क़र्ज़ देने वाले आपस में होड़ कर रहे हैं, या सख़्त सवाल पूछ रहे हैं? क्या कमज़ोर कंपनियाँ आसानी से पैसा जुटा रही हैं? क्या आरबीआई उधार की रफ़्तार से परेशान है, या उसे बढ़ाना चाहता है? इसके लिए पेड डेटा नहीं चाहिए। बस क़ीमत के बजाय पैटर्न ढूँढ़ना आना चाहिए।
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